Thursday, March 20, 2014

वायु-योद्धा


सूरज की उगती
सुनहरी किरणों के साथ
वायु की लहरों पे सवार
निकल पड़ते हैं वायु-योद्धा
हर सुबह
अपने मिशन पर ।

नीले गगन में 
देश की रक्षा के लिये
जान हथेली पे ले घूमते 
आसमान की ऊँचाइयाँ चूमते
तैयार हर पल 
शत्रु  को परास्त करने 
उड़ते रहते 
भारत के अंबर पर।

अपने तन में एक वायुयान लपेटे
सैकड़ों गोलियाँ उस में समेटे
बॉम्ब रॉकेट्स और अनेकों मिसाइलें
शत्रु दिखे तो 
उसे दहला दें ।

पीछे छोड़ देते 
अपना परिवार
बच्चे के आँसू
हर उड़ान में
हर उस पल जब हों आसमान में 
और 
बन जाते हैं शत्रु  के लिये
"आसमानी मौत" ।











Thursday, March 13, 2014

इक ये भी जिंदगी है




इक ये भी जिंदगी है ,
कि हर सुबह ऑफिस में,
कि हर शाम ऑफिस में,
सुबह सोता छोड़ गए लाडले को,
और आने पर सोता ही पाया,
पर ऑफिस का काम,
क्या आज तक कोई खत्म कर पाया ?

अब तो बच्चे भी नहीं जागते विमानों की तेज गड़गड़ाहट से,
जगने पर बस जिद ,
बुलाओ डैडी को तो मैं भी स्कूल जाऊँ,
खुद तो वो टेक ऑफ कर गए,
मैं भी टेक ऑफ कर आऊँ ।

सुबह का नाश्ता अकेला,
लंच में बस इंतज़ार,
शाम की वॉक भी अकेले,
डिनर में बस हम हैं साथ-साथ,
वो भी अगर नाइट-फ्लाइंग की न हो बात ।

पर सुना है काफी खास काम है,
देश की सुरक्षा,
बिरलों को नसीब होती है ऐसी किस्मत,
मातृभूमि की सेवा,
उस जज़्बे में हम भी हैं आपके साथ,
चलेंगे साथ हम,
हर कदम पर,
अगर हमारे एक परिवार के त्याग से,
जलते हैं करोड़ों घरों के दीपक,
रहेगा हमेशा ये अभिमान,
कि हम हैं वायु-संगिनी ।











Thursday, March 6, 2014

राजनीति

ये कैसे लोग ,
ये कैसी राजनीति ,
जनता से बैर ,
बस अपनों से प्रीति ।

कहते हैं खुद को जन-सेवक,
चुनाव के पहले करते हैं जनता को सलाम,
चुनाव के बाद जनता राह तकती इनकी सुबह शाम ।

ताज्जुब है मुझे कि,
चपरासी की नौकरी के लिए भी,
सर्टिफिकेट चाहिए मैट्रीक्युलेशन,
लेकिन राजनेता बनने के लिए ,
नहीं चाहिए कोई क्वॉलिफ़िकेशन ।

जिनके हाथों में जनता सौंपे,
देश की कमान,
जिनको लेने हैं फैसले देश के लिए,
उनका ही नहीं कोई ईमान ।

सड़कों पे चलें  पत्थर और लाठियाँ,
संसद में चलें  जूते और कूर्सियाँ,
कोई गरिमा नहीं कोई शर्म नहीं,
सारा देश देखे तो होता इन्हें फख्र,
इन करतूतों को बहादुरी समझ ।

याद आ गया एक पुराना शेर,
"बरबादे गुलिस्ताँ करने को
बस एक ही उल्लू काफी था,
हर डाल पे उल्लू बैठे हैं,
अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा ।"






घुटता बचपन

सुनहरा समय , बचपन की हंसी-बीती,
कॉपी-किताबों से तनिक न दोस्ती,
सरोकार है तो होटेल और घरों के बर्तनों से,
औजारों, उद्योगों, झाड़ू और पोंछे से,
केवल ऊंची बिल्डिगों वाले शहर में ही नहीं ,
गली-कूचों में भी हैं कई पप्पू-मुन्नी छोटू-चवन्नी,
अपनी मजबूरी का शिकार,बचपन से अंजान,
ज़िम्मेदारी का बोझ ,पेट की भूख से बदहाल,
कहीं ब्रांडेड कपड़े और भोग छप्पन,
कहीं जीवन भर उतरन और जूठन,
कहीं भविष्य के लिए आसमान में जाने के सपने,
कहीं हाथों में घाव और आँखों में नमी लिए अपने,
फटे चिथे कपड़े और नंगे पाँव,
घंटों लगातार फैक्ट्री के धुँए-आँच की तपिश सहते,
कोमल, मासूम बच्चे सहते इस संसार में होने का दंश,
इस कालिमा को भविष्य के कलंक को पोंछना है ।

Tuesday, March 4, 2014

रोशनी की किरण

कहते हैं वक़्त हर दर्द का मरहम है !
आज सत्यमेव जयते के क्रंदन ने ,
आर्त पुकार ने,
हर मानुष को एक बार पुनः सोचने के लिए मजबूर कर दिया होगा...............


दर्द घटता ही नहीं, बढ़ता जा रहा है,
सलवटें मिटती नहीं, बढ़ती जा रही हैं,
लोगों की नजरों में प्यार की थपकी नहीं,
घृणा व जिल्लत की दुत्कार है, 
क्यों ?
शरीर विदीर्ण कर डाला इसलिए ,
निचला हिस्सा फट गया इसलिए,
बदहाल हालत थी इसलिए,
जिंदा जला डाला इसलिए,
रेल की पटरी पर फेंका इसलिए,
तेजाब फेंका इसलिए............

बड़ी ही अच्छी बात कही ,
सड़क पे चलते कुत्ते ने काटा तो ,
सहानुभूति व दया की सौगात.........
इस बर्बरता......... व क्रूरता के बदले क्या ?
प्रश्नों की बौछार, 
अश्लीलता की हदें पार,
व्यक्ति परिवार समाज अदालत  हर कटघरे में,
क्यों ?

उस नन्ही मासूम बच्ची ,
जिसने सीखा भी न था बोलना,
घर से बेघर हुई,
समाज की हिकारत सही,
न जाने कितने दिनों तक चूल्हा न जला,
क्यों ?

बेबसी का आलम इतना दर्दनाक,
बालिका, युवती , प्रौढ़ा, वृद्धा,
स्त्री का हर रूप इस बर्बरता का शिकार,
मासूमियत की सजा है ये ?
क्या है?
हर रूप में दोषी नजरों से बिंधती स्त्री ही क्यों ?
चाक के हर पाट में पिसती क्यों?
सवालों के कटघरों से जूझती क्यों?
क्रूरता की हदें पार करता, दानवीयता का,
हर शिकार,
स्त्री ही क्यों?
सामूहिक हो या एकल हो !
नृशंस समाज की नग्नता का चिग्घाड़ करती है ये  हैवानियत......

मेरे शब्दों की औकात नहीं कि,
उस टभकते, चुभते , मसोसते, सुलगते दर्द को,
उकेर सके......................

सिर्फ नम आँखें कब तक ?
एक बिगुल है , उद्घोष है,
उस खौलते,उबलते उफान की सच्ची तस्वीर है " सत्यमेव जयते" की पहल,
हर स्त्री की पीड़ा का, कराह का मंच है,
जहां अस्पतालों और पुलिस का कच्चा चिट्ठा है खुला,
वहीं एक रोशनी की किरण है,
अब हर नज़र में थोड़ी तो हया होगी,
अब दर्द शायद महीनों, सालों, अरसों सजोना न होगा,
अगली पेशी के लिए उमड़ते सैलाब से,
हर चुभन बह जाने को तैयार होगी,
जगमगाहट में आँखें चौंधियाँ के  झुकेंगी नहीं,
सृष्टि के हर जर्रे में मधुमास होगा,
दर्द को कुरेदते काँटों से, सवाल न होंगे,
बह जाएगा दर्द,
दर्द मुझे देकर जो चैन से जी रहा था,
जिसे लोगों ने मुझे चाह कर भी भूलने न दिया,
जब तक पूरता तब तक फिर कुरेद देते,
इस खूफ़्र से बाहर आकर,
जीउंगी मैं , गढ़ूँगी मैं नए सपने,
कुचल के रख दूँगी दरिंदों को,
इस उम्मीद का दामन थामे रखूंगी हर कदम,
क्योंकि पूरा भारत शायद उनींदी से जाग रहा है............
जय हो भारत...  सत्यमेव जयते ।

 (  हम सबको अपनी पहल करनी होगी ,
क्योंकि हर बूंद का अपना अस्तित्व है )









Tuesday, February 25, 2014

वायु-संगिनी -एक त्याग एक अभिमान

कई बरस पहले 
उड़ते देखा था, मशीनी परिंदों को,
उस नीले आसमां में
यूं कलाबाज़ियाँ करते, उलटते ,पलटते
वो तेज गड़गड़ाहट,
जो बस जाते कानों में 
और ये परिंदे 
चंद पलों में आँखों से ओझल हो जाते 
सोचती थी, कौन होगा ? कैसा होगा ?
वो इंसान, उस लड़ाकू विमान में ।

क्या पता था कि, 
किस्मत मुझे ले आएगी, उसी परिंदे के पास
इक डोर जुड़ जाएगी इस परिंदे से
वो आवाज़ जो बचपन से सुनी
बन जाएगी मेरे जीवन का अंश 
वो आसमां का बासिन्दा
बन जाएगा मेरा सर्वांश।

भोर की पहली किरण के साथ
निकल पड़ते हैं आशियाने से
कर्म करने 
स्क्वाड्रन के लिए,
हर सुबह हो जैसे 
तैयारी रण की
निकलती है टोलियाँ इन परिंदों की
अपने अभियान पर
एयर डिफ़ेंस , स्ट्राइक मिशन , 
एयर कॉमबैट , इंटर्डिकशन
जाने क्या नाम ,जाने क्या काम !
इन्हीं अभियानों में सुबह से लेकर शाम  
जिंदगी की चहल पहल से दूर
अपनी ही धुन में मस्त 
आसमानी जिंदगी ।

चाँदनी रातों में भी अक्सर तन्हा होते हम
जज़्बातों में, ख्वाबों में, 
तसवीरों में, ख्यालों में 
अकेले गढ़ते सपने हम,
अधूरी ख्वाहिशें , अधूरे हम 
पर !
उन पूनम रातों में 
चाँदनी की लहरों पे सवार
ये परिंदे 
गढ़ते युद्ध-कौशल। 

लौट के घर आने पर 
उनींदी आँखों से देख खिलता चेहरा इनका
रात की तपिश हो जाती गुम
इस अभिमान में कि 
हम भी हैं साथ देश की रक्षा में 
वायु-संगिनी बन कर ।


















Sunday, February 23, 2014

सिद्दत



सीने में उफनते सैलाब को
मंजर दे दिया
दहकते ख्वाबों को मैंने 
आशियाँ दे दिया


जो बुझ चुके थे,
न जलने के लिए कभी 
उनमें आशा की लौ लगा ही दी तूने
परचम को नया तसव्वुर
व नयी मंजरों की राह जगा भी दी तूने।


तू वो गुलिस्ताँ है 
जो चमन में रौनक लाता है
तू वो जाम है 
जो छोड़े न छूटता है 


तेरी कसम 
तेरी राहों में जां बिछा देंगे
पर क्या करें तेरी नजरें निगाहें 
तो ढूंढती हैं हर रोज़ नया आशियाँ ।


आवाज़ दी तूने तो 
आगाज़ बन गए सितारे,
सिद्दत की जो तूने 
हम  बन गए तुम्हारे ।


तूने छूआ तो सिहर सी गयी मैं
तूने देखा तो पिघल सी गयी मैं ।


हवाओं में भरी उड़ान तो परिंदे भी साथी बने
अब तो आकाश भी तेरे आने की राह तकता है
तुझे अपना ही हमकदम
अपने ही चमन का रौनक मान बैठा है ।


दो जहां के तख्तो-ताज का मालिक है तू,
ये रुपये-पैसे की नहीं , तेरी !
अपनी कमाई इबादत है ।